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Showing posts from December, 2024

एकलव्य - सा किरदार है मेरा

 जंजीरों से बंधा , गुणों  से भरा   अलौकिक प्रकाश से प्रकाशवान हूँ मैं , लेकिन , एकलव्य -सा किरदार है  मेरा  |  चारों तरफ था घोर अंधेरा , ना मिला कहीं गुरु का डेरा | फिर भी विश्वास ने है घेरा  , बारंबार  अभ्यास ने जड़ पकड़ा  | तभी एक विचार मन में  आया गुरु प्रतिमा ने आश्वासन दे डाला , लेकिन एकलव्य -सा किरदार है  मेरा  | अंगूठे को काटकर  , किया गुरु को समर्पण  गुरु  हुए खुश  मैं हुआ धन्य  | ना अर्जुन बनना था "सोनी " को , क्योंकि मैं एकलव्य जो ठहरा |

हे मोबाइल !

कितने गुण लेकर पैदा हुए हो तुम , काश तुम -सा खुशनसीब मैं भी होती | ना जाने कितने आकर्षण से भरे हो तुम , काश मैं भी किसी को वश में  करती |  रोजमर्रा  के ज़िंदगी में शामिल हो गये हो तुम , चाहे मैं , कितनी भी व्यस्त क्यों ना रहती | सबके खास बन चुके हो तुम , जो तुम ना होते तो "सोनी "क्या करती ? शीर्ष पर पहुँच गये हो तुम ,  हे मोबाइल मैं , तुम्हारी ही बात हूँ  करती | सबके हाथों की शोभा बढ़ाते हो तुम   हर जगह तुम्हारी  मांग है रहती | हे मोबाइल  ! तुम धन्य हो ,  तुम धन्य हो , तुम धन्य हो | अनंत  गुणों से भरपूर तुम खास हो , तुम खास  हो , तुम सबके लिए खास हो |