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एकलव्य - सा किरदार है मेरा

 जंजीरों से बंधा , गुणों  से भरा  

अलौकिक प्रकाश से प्रकाशवान हूँ मैं ,

लेकिन , एकलव्य -सा किरदार है  मेरा  | 


चारों तरफ था घोर अंधेरा ,

ना मिला कहीं गुरु का डेरा |

फिर भी विश्वास ने है घेरा  ,

बारंबार  अभ्यास ने जड़ पकड़ा  |


तभी एक विचार मन में  आया

गुरु प्रतिमा ने आश्वासन दे डाला ,

लेकिन एकलव्य -सा किरदार है  मेरा  |


अंगूठे को काटकर  , किया गुरु को समर्पण 

गुरु  हुए खुश  मैं हुआ धन्य  |

ना अर्जुन बनना था "सोनी " को ,

क्योंकि मैं एकलव्य जो ठहरा |














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